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विवाह संविदा है संस्कार नहीं


सनातन काल में मनुष्यों की सभी गतिविधियों को नैतिकता के आधार पर नियंत्रित की जाती थी

तथा विवाह को पूर्व जन्म तथा विधाता द्वारा स्थापित संबंध के रूप में देखा जाता था इसलिए विवाह को संस्कार माना जाता है!


विवाह क्या है?


विवाह स्त्री पुरुष का एक ऐसा संबंध है जिसमें कि स्त्री पुरुष अपने जीवन के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए सभी प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं।

विवाह के फल स्वरुप जो संतानोत्पत्ति होती है, उनका लालन-पालन भरण पोषण भी विवाह के प्रादुर्भाव का एक मुख्य कारण रहा है!


सनातन धर्म में विवाह को संस्कार की रूप में देखे जाने की अवधारणा से अनेक समाज संतुष्ट नहीं थे।

इसलिए अन्य समाजों ने विवाह को संविदा ही माना तथा विवाह विच्छेद के प्रावधान भी बनाए।


अधिकांश समाजों में विवाह को वर वधु की सहमति से होने वाला विशुद्ध कानूनी अनुबंध ही माना जाता है।

जैसे जैसे कानूनों का विकास हुआ तो मनुष्य के दायित्व को भी विधिकता प्रदान की गई, तथा संविदायिक व गैर संविदायिक के रुप में विभाजन किया गया।


हिंदू विवाह को पूर्व जन्मों का बंधन तथा विधाता के संस्कारों के रूप में देखे जाने के कारण गैर संविदायिक दायित्व के रूप में स्वीकार किया जाता रहा ।

विवाह महिलाओं के सुखमय जीवन का एकमात्र साधन था।


महिलाओं में बढ़ती स्वेच्छांदा की मांग व सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया जाने से विवाह को संस्कार के रूप में देखे जाने की व्यवस्था लुप्त प्राय हो रही है।


विवाह कोई स्वरचित बंधन नहीं बल्कि स्त्री पुरुष का स्वविवेक से लिया गया एक निर्णय है।

जिसमें कि 1 पक्ष का प्रस्ताव व दूसरे पक्ष की स्वीकृति जो किविवाह का रूप प्रदान करती है!


विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष किया जाना तथा सच्चे वैवाहिक संबंधों में पति पत्नी को बराबर स्वतंत्र होना तथा आत्मनिर्भरता व दायित्व एक दूसरे पर पारस्परिक होना विवाह को संविदा प्रतिपादित करता है!


संविदा अधिनियम 1872 उपलब्ध होने की स्थिति में हिंदू अधिनियम 1955 की आवश्यकता ही नहीं थी, लेकिन विवाह में किसी प्रकार का लिखित दस्तावेज तैयार ना किए जाने तथा बढ़ते विवाहित विवादों की वजह से हिंदू विवाह अधिनियम 1955 बनाया गया।

इस नियम के बनने व इस अधिनियम में 1976 में किए गए संशोधन के बाद विवाह पूरी तरह संविदा बन चुका है।

लेकिन हिंदू समाज में आज भी लिखित दस्तावेजों की अनुपस्थिति के कारण संविदा के रूप में स्वीकार नहीं किया जा रहा है।

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 रीति - रिवाजों के अनुसार किए गए शादी को वैद्यमानती है लेकिन धारा 8 के अनुसार अब विवाह का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है।

तथा पंजीकरण के लिए आवश्यक सभी दस्तावेज प्रस्तुत कर प्राप्त किया गया विवाह प्रमाण पत्र विवाह का सटीक प्रमाण है।

इसके बाद धारा 10 में दिए गए न्यायिक पृथक्करण

धारा 11 में शून्य विवाह।

धारा 12 में शून्य कार्णीय विवाह।

धारा 13 में विवाह विच्छेद की प्रावधानों ने विवाह को स्पष्ट रूप से संविदा की श्रेणी में रख दिया है।

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 संविधान के अनुच्छेद 21 के उल्लंघन के आधार पर कई बार उच्चतम न्यायालय में विचारण हो चुकी है।

और वह दिन दूर नहीं है जब धारा 9 हिंदू विवाह अधिनियम इस आधार पर असंवैधानिक घोषित कर दी जाएगी


विवाह को संविदा के रूप में देखा जाना स्त्रियों को संरक्षण सुरक्षा प्रदान करेगा ही साथ ही बढ़ते वैवाहिक विवादों को रोकने में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

तथा विवाह के बाद मनुष्य एक लंबे जीवन को जीने की नियम व कायदे किए जा सकते हैं तथा जीवन के उतार-चढ़ाव का समावेश भी इसमें किया जा सकता है

विवाहित पुत्रियों को पूर्वजों की संपत्ति में बराबर हिस्सा दिए जाने से वैवाहिक संबंधों में जो विवाद उत्पन्न होने की संभावना है उन पर भी रोक लग सकती है।




इस प्रकार विवाह एक संविदा है तथा सभी लिखित दस्तावेजों के आधार पर विवाह एक प्रथा के रूप में विकसित की जानी चाहिए!

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